Saturday, April 4, 2020

ADDRESS PEOPLE'S CONCERN

Attend to People's Concerns on a War-Footing

The country has entered the second week of the 21-day lockdown to
contain the community spread of COVID-19 pandemic.

Many problems have surfaced in a sharp manner which need to be
resolved urgently. Many of these were anticipated but unfortunately no
remedial action was taken before the announcement of the lockdown.

1. Crores of people have lost their sources of livelihood. The exodus
of migrant workers from urban centres has shown the degree of
unsettling of people's livelihood that this sudden lockdown
announcement caused. There is an urgent need to stop the growth of
widespread hunger and malnutrition. The COVID-19 pandemic feeds on
such conditions of the people. The promised Rs5000 to all Jandhan, Bpl
and unorganized workers must be transferred immediately. The central
government must provide 35kgs per family to all migrant workers and
poor ,with or without ration cards, from the 7.5 crore of stock of
food-grains, all across the country. Proper health care facilities for
the migrant workers and others who have travelled from various parts
must be put in place. Effective and hygienic quarantine facilities
must be established in all parts of the country. Police brutalities on
migrant workers must be put an end to and strict action must be taken
against those who gave such orders.

In all urban centres, particularly in the large conglomeration of
urban slums, provision of food grains and essentials to the needy is
urgently needed to prevent hunger, starvation and the community spread
of COVID-19.

This is the harvest season. The farmers need to be supported to ensure
that the food crop is not wasted which is essential for our food
security.

2. Much of this work will have to be undertaken in the states. The
state governments are already facing severe financial crunch and would not be in a position to undertake these tasks. They must be liberally
assisted financially by the Centre. Limit on States' borrowing must be increased. On this depends the life and livelihood of crores of Indian people.

3. During the lockdown increasing reports are now appearing of growing
shortages of essential commodities and medicines. There is no clarity on the movement of trucks carrying essential goods across the states.
This must be set right immediately and all essential requirements of the people must be met.

4. There is a growing genuine complaint from the health workers who
are courageously discharging their duties, of the lack of personal protective equipment and medicines. They must be provided immediately.
Equipments like Ventilators must be acquired urgently on priority.
People suffering from other life-threatening conditions cannot be
neglected for treatment by the health facilities. Some reports have
estimated that at least 43 such patients have died so far.These must
be augmented by the central government urgently.

5. Large scale testing for COVID-19 should be undertaken during this period of lockdown to identify clusters where this pandemic is
spreading, isolate those areas and treat the people properly. The ICMR has now approved a rapid testing kit. This must be deployed on a large
scale across the country. Currently, India's testing rate is one of the lowest in the world. It is 241 times lower than South Korea.

6. There is growing concern over the rabid communal campaigns being conducted after the Tablighi Jamaat congregation which was an act of
gross irresponsibility by the organisers. But to convert that into a
campaign for communal polarisation only divides the united effort required by all Indians to battle this pandemic and defeat it.
Effective steps must be taken to dispel stigma, generating empathy not
criminalizing patients. Curb fake news and communicate scientific facts of the pandemic. The central government should urgently intervene to ensure that this fight against COVID-19 is a fight in which all of us are united and determined to defeat it.

Repeated calls for people's solidarity actions by the PM cannot substitute the need to address the above issues on a war footing.

It is called upon the central government to immediately
undertake these measures in the interests of our people's welfare and
to strengthen out fight against COVID-

Friday, April 3, 2020

INDIA - FACT SHEET

मोदी P.M बनने के बाद पड़ोसी राष्ट्रों को जो खैरात बांटी थी और फिजूलखर्ची का लेखा-जोखा.
🏵️ भुट्टान को 10000 करोड
🏵️  मंगोलिया को 70000 करोड
🏵️ बांग्लादेश को 15000 करोडट
🏵️ मोरेसीयस को 5000 करोड
🏵️ नेपाल और आफ्रिकी देशो मे 39 अरब
🏵️ सरदार स्टेच्यू के लीये 3000 करोड
🏵️ उद्योगपतियों का ऋण माफ 5 लाख 55 हजार करोड
🏵️ मोदी की विदेश यात्राओं का ख़र्च 2500 करोड से ज्यादा
🏵️ BJP का मुख्यालय का ख़र्च 350 करोड
🏵️ मोदी और BJP के विज्ञापन 5000 करोड से भी ज्यादा
 🏵️ मोदी की सुरक्षा में 24 घंटे का खर्च 1 करोड़ 62 लाख रुपये है। यानी एक साल का 591 करोड़ 30 लाख रुपये

🏵️ पिछले पांच साल मे कुंभ मेलाओ का ख़र्च  करीब 15000 करोड
🏵️ USA प्रेसिडेंट ट्रम्प के स्वागत के लीये 100 करोड

*मोदी का पूरा रिपोर्ट कार्ड*(अगर गलत लगे तो गुगल पर जाकर देख लेना)

आप यह देखकर चौंक जाएंगे कि पिछले 6 वर्षों में भारत कैसे बदल गया है, इसमेंं अगर कुछ भी गलत लगे तो बताएं...अन्यथा इस सच को स्वीकार करें..

 1  भारत अब उच्चतम बेरोजगारी दर से पीड़ित है  (NSSO डेटा)

 2 दुनिया के सभी शीर्ष 10 सबसे प्रदूषित शहर अब भारत में हैं (WHO डेटा)

3  भारतीय सैनिकों की  शहीद की संख्या 30 वर्षों में सबसे अधिक है  (वाशिंगटन पोस्ट)

4  भारत में अब 80 वर्षों में सबसे अधिक आय असमानता है (क्रेडिट सुइस रिपोर्ट)

5  भारत महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खराब देश बन गया है  (थॉमस रॉयटर्स सर्वे)

6  उग्रवाद में शामिल होने वाले कश्मीरी युवा इन वर्षों में सबसे ज्यादा हैं  (भारतीय सेना के आंकड़े)

7 .इस बार भारतीय किसानों को पिछले 18 साल में सबसे खराब कीमत का सामना करना पड़ा है (WPI डेटा)

8   मोदी के पीएम बनने के बाद अब तक की सबसे ज्यादा गाय से जुड़ी हिंसा और रिकॉर्ड  मॉबलिंचिंग की घटनाएं हुई हैं। (इंडिया स्पेंड डेटा)

9 भारत अब विश्व का दूसरा सबसे असमान देश है (ग्लोबल वेल्थ रिपोर्ट)

10 भारतीय रुपया अब एशिया की सबसे खराब प्रदर्शन वाली मुद्रा है।(मार्केट डेटा)

11  भारत पर्यावरण संरक्षण में विश्व का तीसरा सबसे बुरा देश बन गया है । (EPI 2018)

12 भारत के इतिहास में पहली बार विदेशी धन और भ्रष्टाचार को वैध बनाया गया है । (वित्त विधेयक 2019)

13  हमारे वर्तमान प्रधान मंत्री 70 वर्षों में सबसे कम जवाबदेह प्रधानमंत्री हैं । (प्रथम पीएम 0 प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए )

14  भारत के इतिहास में पहली बार, CBI बनाम CBI, RBI बनाम Govt, SC बनाम Govt के झगड़े इसलिए हुए क्योंकि मोदी सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं पर नियंत्रण चाहते हैं।

15   भारत के इतिहास में पहली बार, सुप्रीम कोर्ट के 4 जजों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा कि ”लोकतंत्र खतरे में है, हमें काम नही करने दिया जा रहा”

16. भारत के इतिहास में पहली बार, रक्षा मंत्रालय कार्यालय से चोरी हुए शीर्ष गुप्त रक्षा दस्तावेज (राफेल)

17   पिछले 70 सालों में असहिष्णुता और धार्मिक अतिवाद सबसे ज्यादा है

18  भारतीय मीडिया अब तक के वर्षों में सबसे खराब है ।

19.भारत के इतिहास में पहली बार, अगर आप मोदी सरकार की आलोचना करते हैं, तो आप पर  देशद्रोही का लेबल लगता है जो की बहुत शर्मनाक है।

इस संदेश में जो कुछ भी कहा गया है,  वह जुमला नहीं है। ऊपर दिया गया सभी डेटा 100% सत्यापित फैक्ट्स हैं। आप किसी भी बिंदु पर एक Google खोज करके उन्हें स्वयं सत्यापित कर सकते हैं। हमारे भारत के साथ जो हुआ है उसकी वास्तविकता यही है।

मोदी सरकार पिछले 70 वर्षों में सबसे खराब भारत सरकार है।
देश को खड़ा करने मे या किसी भी तरह का दो कौड़ी का भी योगदान नही है ऐसे मोदी की सुरक्षा में 24 घंटे का खर्च 1 करोड़ 62 लाख रुपये है। यानी एक साल का 591 करोड़ 30 लाख रुपये।

कुछ लोग कहते हैं कि 2019 का चुनाव भारत में होने वाला आखिरी चुनाव है ,क्योंकि मोदी ने जीतने के बाद हमारे लोकतंत्र के सभी संस्थानों को अपने नियंत्रण में कर लिया है और एक तानाशाह बन गये हैं ।

आज *"चोर" और "चौकीदार" की बहस के बीच रोज़ी-रोटी, शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, भ्रष्टाचार, कालाधन, नोटबंदी, रोजगार, महंगाई आदि सभी मुद्दें उड़न छू हो गये हैं।

लेकिन ये तय है कि जब देश को बर्बाद करने वालों की सूची तैयार होगी तब इन दो वर्गों का नाम सबसे ऊपर होगा:-
1.बिकाऊ मीडिया
2. मूर्ख अंधभक्त

*✍पहले चाय बेची या नही बेची उसका कोई सबूत आजतक नही मिला, पर देश जरूर बेच रहे है उसके प्रमाण रोज बिकती हुई संपदा को देखकर जरूर मिल ही रहे है।🤬🤨*

मोदी राज में भारत बिकाऊ है कोई खरीदार है ???

● लाल किला बिक गया...
● रेलवे स्टेशन बिक गये...
● एयरपोर्ट बिक गये ...
● कोयले की खदानें बिक गयी ...
● रेलगाड़ी बिक गयी ...
● बन्दरगाह बिक गया ...
…....................................................................................

बेचने की तैयारी
● LIC बिकेगी ...
● IDBI बिकेगी ...
● एयर इंडिया बिकेगी ...
● BSNL बिकेगा ...
● ONGC बिकेगी ...
● Indian Oil बिकेगा ...
● HPCL बिकेगा ...
.............................................................................साहब कहते थे देश नहीं बिकने दूंगा और अब तो बस देश का नाम ही बचा है
★ बेचना बहुत आसान काम है
★ इस सरकार नें एक भी सार्वजनिक उपक्रम बनाया हो कोई बता सकता है ??

★ भाइयों बेचनें के लिये नहीं कुछ नया पैदा करनें के लिये सरकार बनायी थी बेचनें का काम तो कोई भी आम आदमी कर सकता है ?

★ क्या ऐसी सरकार जनता के हित में है ???
     जनता को गम्भीरता से सोचना होगा ???

*इस सरकार की सुखद बात यह रही कि नाली से गैस, बतख से ऑक्सीजन, गोबर से कोहिनूर, रोजगार में पकौड़े इतनी मनोरंजक सरकार है कि 6 साल कैसे कट गये पता ही नहीं चला..*
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Thursday, April 2, 2020

CHRONOLOGY Of CORONA (INDIA)

Corona वायरस की रोकथाम में 13 से 15 तक निजामुददीन दिल्ली में आयोजित तबलीगी कार्यक्रम को बाधक बताने का प्रचार बहुत तेज है।  तबलीगी कार्यक्रम में आने के लिए दूसरे देशों के मुसलमानों को बीजा किसने दिया? हवाई अड्डों पर बाहर से आने वालों की टेस्टिंग क्यों नहीं की? 15 मार्च को तबलीगी कार्यक्रम समाप्त होने के बाद बाहर से आए हुए लोगों को ढूंढ ढूंढ कर वापस विदेश क्यों नहीं भेजा? Corona वायरस के भारत में फैलने और उसकी रोकथाम के संबंध में भारत सरकार ने क्या तैयारी की उससे जुड़े कुछ सवाल हैं।
1- Corona वायरस दिसंबर 2019 में चीन में डिटेक्ट हुआ।
2- भारत में पहला Corona वायरस का मरीज गुड़गांव में वेदांता अस्पताल में भर्ती हुआ।
3- इटली से कुछ पर्यटक जोधपुर घूमने आए थे। उनसे ही Corona वायरस भारत में फैलना शुरू हुआ था। उन पर्यटकों को भी गुड़गांव में भर्ती किया गया था।
4- 12 फरवरी 2020 को राहुल गांधी ने  corona वायरस के खतरे पर ट्वीट किया था। अन्य विपक्षी नेताओं ने भी ये सवाल लोक सभा में सरकार के सामने उठाया था।
5- 20 फरवरी 2020 को मोदी ने ट्वीट के जरिए लोगों को Corona से डरने की जरूरत नहीं है। भारत में ये वायरस नहीं आएगा।
6- 5 मार्च को स्वास्थ्य मंत्री हर्ष बर्धन ने भी ट्वीट कर विपक्ष की Corona पर की गई चिंता की खिल्ली उड़ाई थी।
7-18 जनवरी से 23 मार्च तक विदेशों से 15 लाख लोग भारत आए।  बाहर से भारत आने वाले लोगों की टेस्टिंग हवाई अड्डों पर ही क्यों नहीं की गई? हवाई अड्डों पर टेस्ट करने के बाद आसानी से corona वायरस के मरीजों की पहचान करके उन्हें हॉस्पिटल्स में भर्ती करके देश की जनता को Corona वायरस के कहर से बचाया जा सकता था। लेकिन ऐसा क्यों नहीं किया?
8-  विदेशी लोगों को भारत आने के लिए बीजा भारत सरकार ने दिया था। विदेश से आने वाले विदेशी पर्यटकों के बीजा निरस्त क्यों नहीं किए?
9- देश में एक मात्र टेस्टिंग किट , मेडिकल सुविधाएं बनाने वाली कंपनी को विदेश में विपक्ष की रोक लगाने की मांग को अनसुना कर 24 मार्च तक निर्यात करने दिया गया।24 मार्च को निर्यात पर रोक लगाई है।
10-  सरकार ने तीन महीने तक Corona वायरस की रोकथाम के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाया?
11- Corona वायरस की रोकथाम के लिए मेडिकल सुविधाओं के निर्यात पर रोक क्यों नहीं लगाई।
12- Corona वायरस के संडे 29-03-2020 तक मात्र 35000 हजार लोगों का ही टेस्ट हुआ है। जबकि विभिन्न देश कई लाख लोगों का टेस्ट कर चुके हैं।
13- मेडिकल सुविधाओं की कमी के चलते, पहले से एतिहात बरते बिना विदेश से लोगों को देश में आने दिया गया। ऐसे में लॉक डाउन के अलावा कोई विकल्प सरकार ने नहीं छोड़ा।
14-  दुनियां के अनुभव से भारत ने कुछ नहीं सीखा। अकेले लॉक डाउन से Corona वायरस के कहर का मुकाबला नहीं हो सकता है।
15- लॉक डाउन करने से पहले भी सरकार ने कोई योजना नहीं बनाई। न तैयारी की। जिसके कारण लॉक डाउन के पहले सात दिन मजाक बन गए।
16- लाखों लोग सड़कों पर धकेल दिए गए। भूखे प्यासे मजदूरों की शर्मसार करने वाली घटनाओं ने लॉक डाउन का क्रूर चेहरा दिखाया। अब तक जितने लोग Corona वायरस के कारण मरे हैं, उससे ज्यादा लोग भूख प्यास, सैकड़ों किलोमीटर पैदल अपने अपने घर जाने के दौरान मर चुके हैं।
17- 22 मार्च 2020 को जनता कर्फ्यू लगाया। देश की जनता ने ईमानदारी से इसका पालन किया। लेकिन खुद प्रधानमंत्री की नासमझी वाली अपील पर बीजेपी के लोगों ने सड़कों पर उतर कर झुंड के झुंड में कहीं कहीं जुलूस बनाकर ताली थाली बजाई। क्यों?
18- 25 मार्च को लॉक डाउन के बाद उ प्र के मुख्यमंत्री योगी 200 से अधिक लोगों के साथ अयोध्या में मंदिर में पूजा अर्चना करते हैं। ये कैसा लॉक डाउन?
19- 2000 से अधिक विदेशी पर्यटक अभी भी गोवा में होटलों में रह रहे हैं। उन्हें उनके देश क्यों नहीं भेजा गया?
20- लोगों भोजन बांटने के नाम पर आरएसएस के लोग झुंड बनाकर शहर शहर घूम रहे हैं। ये क्या है?
किसी एक धर्म विशेष को निशाना बनाने के बजाय सभी धर्मो व संस्थाओं के लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
केवल तबलीगी कार्यक्रम को मुद्दा बनाकर प्रचार करना मोदी सरकार की अकर्मण्यता और तानाशाही पूर्ण क़दमों से ध्यान बंटाने की कोशिश है।

Saturday, March 28, 2020

CORONA LOCK-OUT

"So no testing! Makes sense for the narrative... One epidemiological model suggests 25000 infections already. Hopkins study categorically, repeat, categorically states lockdown at the time India has done makes marginal difference.

National lockdown never made any sense, now or later. You lockdown clusters and hotspots, not the country. The mantra only is: test, test, detect, isolate, treat.

India, meaning GOI, the Ministry, the NITI, the regime, slept in January and February. Instead of preparing scenarios, action plans, SOPs, reading the big models, listening to the rush of models and research, what were they doing full time: staking everything on Delhi elections, suppressing CAA protests, inflicting violence in JNU, Jamia, UP killings, Delhi riots, MP Govt fall, Trump jamboree visit...Please draw date wise timelines.

Then when States begin their fight against Corona led wonderfully by Kerala, Modi megalomania is bruised. He specialises in milking disasters. So, with zero thought and preparation, he launches the catchy macho slogan. National Lockdown. And everything turns topsy turvy. What was this NDMA doing? Those fellows. After all, the NDM Act was invoked. Where are their studies, models and reports?

The States were responding well. There were barriers and graded lockdowns. There was no panic, little disruption.
In comes Modi, hell comes. 40 crores migrants unhinged. All production, transport, delivery collapses.. and GOI is fiddling with the definition of essential goods. And they didn't know migrants exist. And mandis and rabi crop. 

The social distancing achieved by States pre-Modi bullshit was better than what exists today. GOI has forgotten about Stage 3. ICMR not seen much with their funny statements and claims. GOI botched big time.

Conclusion: Hats off to all States and their CMs except the UP CM who too suffers from megalomania and has PM ambitions. Shah not seen or felt. Modi endangers us with every broadcast. The economy is finished. The collateral misery is already accomplished. Now if India escapes the wrath of corona, or the damage is not collosal, we should thank: the States for great work; the heat factor; the lower transmission rate of the virus; herd immunity; the throw of the dice and luck.

And if we are still fools enough to give tick marks to Modi and his megalomania, then I can only pity such blindness and irrationality."

Friday, March 20, 2020

CORONA VIRUS

अब जबकि, कोई महामारी अकल्पनीय वैश्विक संकट का रूप लेते हुए हमारे देश में भी कोहराम मचाने को आ पहुंची है तो अहसास होता है कि स्वास्थ्य तंत्र का सरकारी सिस्टम क्यों मजबूत होना चाहिये।

     हम इटली की हालत देख रहे हैं जो जर्मनी और फ्रांस के बाद यूरोजोन की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। आज की खबरों में हमने पढ़ा कि वहां बीते 24 घंटों में कोरोना वायरस के कारण 475 मौतें रिकार्ड की गई हैं, जबकि विशेषज्ञों का कहना है कि संख्या इससे भी ज्यादा हो सकती है क्योंकि इटली का मेडिकल सिस्टम दुरुस्त न होने के कारण दूर दराज के क्षेत्रों में बहुत सारे लोगों की जांच ही नहीं हो सकी और उनकी मौत को कोरोना प्रभावितों के दायरे में नहीं रखा गया।

     बड़ी और विकसित अर्थव्यवस्था होने के बावजूद इटली बीते एक-डेढ़ दशक से गहरे आर्थिक संकट से घिरा रहा है। एक दौर में तो स्थिति यहां तक आ गई कि राशि इकट्ठी करने के प्रयासों के तहत सरकार द्वारा जारी दस वर्षों के इतालवी बांड को भी खरीदारों के लाले पड़ गए थे।

   बस...क्या था, अर्थशास्त्रियों के एक वर्ग ने शोर मचाना शुरू किया कि इटली का सरकारी खर्च बहुत अधिक है और संकट से निपटने के लिये सरकारी खर्चों में कटौती बहुत जरूरी है।

   किसी भी अर्थव्यवस्था में जब सरकारी खर्चों में कटौती की मुहिम शुरू होती है तो उसका सबसे पहला शिकार सरकारी शिक्षा और स्वास्थ्य का सिस्टम होता है। इटली में भी यही हुआ।

     आज जब इटली किसी आकस्मिक महामारी की चपेट में आया तो उसका ध्वस्त हो चुका मेडिकल सिस्टम चुनौतियों से निपटने में अक्षम साबित हुआ। वहां जनता की जरूरतों के अनुपात में पर्याप्त डॉक्टरों और सहयोगी स्टाफ की कमी है, चिकित्सा उपकरणों का अभाव है। नतीजा वहां के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। खबरें बताती हैं कि जिस रफ्तार से वहां संक्रमण बढ़ रहा है उस अनुपात में लोगों का टेस्ट नहीं हो पा रहा और संक्रमित व्यक्ति वायरस के फैलाव के वाहक बन कर समस्या को और अधिक बढाते जा रहे हैं।

   जरा इस त्रासदी पर गौर करें। अस्पतालों, डॉक्टरों, सहयोगी स्टाफ और चिकित्सा उपकरणों की कमी के कारण इटली में कोरोना से संक्रमित बूढ़े लोगों को ईश्वर के भरोसे छोड़ कर अपेक्षाकृत युवा लोगों के इलाज पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है।

   लानत है ऐसे सिस्टम को, जहां फोरलेन और फ्लाईओवर को विकास के मानकों के रूप में स्थापित कर अस्पतालों, स्कूलों और विश्वविद्यालयों को सरकारी खर्च के लिये बोझ मान लिया गया हो।

     उपेक्षा का शिकार हो कर बिना उचित इलाज के मरने वाला इटली का कोरोना संक्रमित हर वृद्ध व्यक्ति इस अवधारणा के गाल पर तमाचा है जिसमें आम लोगों की चिकित्सा पर खर्च को सरकारों के लिये बोझ मान लिया गया है।
    जहां आर्थिक संकट गहराया, पहली कटौती शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च में करो क्योंकि बेशुमार मुनाफे के लालच में जीभ लपलपाती निजी पूंजी इन कमाऊ क्षेत्रों में आधिपत्य स्थापित करने को पहले से तैयार बैठी है। सरकारें अपनी चादर जितनी समेटती जाएंगी, निजी पूंजी की चादर उतनी फैलती जाएगी।

        कोरोना संकट चीन से जाकर यूरोप में पसर गया है और अब एशिया में हाहाकार मचाने को फैलता जा रहा है।

     यूरोप के देश इस संकट से निपटने के लिये निजी पूंजी द्वारा संचालित अस्पतालों पर भरोसा नहीं कर रहे। उनका सरकारी मेडिकल सिस्टम एशियाई देशों के मुकाबले बेहतर है और निजी अस्पतालों की निगहबानी के लिये नियामक तंत्र भी एशियाई देशों के मुकाबले मजबूत और सक्रिय है। तथापि, स्पेन ने कोरोना संकट से निपटने के लिये तमाम निजी अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण कर उन्हें सरकार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में ले लिया।

   स्पेन का यह कदम बताता है कि इतनी व्यापक मानवीय त्रासदी से निपटने में लोगों को निजी अस्पतालों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता और सरकारों को ही सामने आना होगा।

    भारत में भी आज केंद्र और राज्य सरकारें ही सामने आ रही हैं। जैसा भी है, सरकारी मेडिकल सिस्टम ही कोरोना से युद्ध के अगले मोर्चे पर आ खड़ा हुआ है। सरकारी स्वास्थ्य कर्मियों की छुट्टियां रद्द कर दी गई हैं, उन्हें लगातार ड्यूटी पर बने रहने के निर्देश जारी किए गए हैं, सरकारी डॉक्टर कई-कई दिनों से अपने घर नहीं जा पा रहे हैं, एक-एक डॉक्टर तीन-तीन डॉक्टरों के बराबर काम कर रहे हैं और सहयोगी स्टाफ पर काम का दबाव इतना बढ़ गया है कि उनमें से अनेक के बीमार पड़ने की खबरें भी आने लगी हैं।

    यह कोई छिपी बात नहीं है कि सरकारी खर्च कम करने के नाम पर देश भर के सरकारी अस्पतालों में जरूरत के अनुसार डॉक्टरों और सहयोगी स्टाफ की नियुक्तियां नहीं की गई हैं और हर जगह इनकी इतनी कमी है कि आम लोगों का सामान्य इलाज भी मुश्किल है, महामारी की तो बात ही क्या। यही हाल चिकित्सा उपकरणों की आपूर्त्ति का भी है जो आवश्यकता से बेहद कम हैं।

     आपके पास था सरकारी मेडिकल सिस्टम। जैसा भी था...और बीते दशकों में सरकारों ने इसे जितना भी कमजोर किया हो...वही सरकारी सिस्टम आज कोरोना संकट के सामने मोर्चे पर आगे खड़ा है। आम लोगों का सहारा यही सिस्टम है। इससे क्या फर्क पड़ता है कि कितने लोगों का आयुष्मान बीमा योजना का कार्ड बना है और वे इस योजना का लाभ लेकर निजी अस्पतालों के आरामदेह बिस्तर पर जा कर लेट सकते हैं।

    मोदी जी के नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत को हमने अभी पिछले वर्ष ही टीवी पर नफ़ीस अंग्रेजी में यह बोलते सुना था कि 'एलिमेंटरी एडुकेशन' और 'मेडिकल सिस्टम' का 'कंप्लीट प्राइवेटाइजेशन'  होना चाहिये और जो गरीब हैं उन्हें फीस भरने के लिये सरकार अलग से सहायता दे सकती है। नीति आयोग तो देश के तमाम सरकारी जिला अस्पतालों में निजी पूंजी के निवेश के लिये एक कार्य योजना पर काम भी कर रहा है।

    आज नीति आयोग को एक कार्य दल बनाना चाहिये जो इस पर रिसर्च करे कि वर्त्तमान कोरोना संकट से निपटने में तीन सितारा से लेकर पांच सितारा और सात सितारा प्राइवेट अस्पतालों की कितनी और कैसी भूमिका है। आखिर यह राष्ट्रीय आपदा है और देश की गति थम गई है। तो...भव्य और सुविधासंपन्न अट्टालिकाओं में संचालित निजी अस्पताल, जिनके मालिकान देशभक्ति की कसमें खाते रहते हैं, इस व्यापक मानवीय त्रासदी के समय देश के आम लोगों के लिये क्या कर रहे हैं?

      देश अभी कोरोना संकट के दूसरे स्टेज में है लेकिन हालात खराब होते जा रहे हैं और संकट गहराता जा रहा है। इटली का सरकारी मेडिकल सिस्टम यूरोपीय मानकों के मुताबिक ध्वस्त होने के कगार पर जरूर था, लेकिन अभी भी वह आनुपातिक रूप से भारत से बेहतर है। आखिरकार, महज 6 करोड़ 50 लाख जनसंख्या वाला इटली, जिसकी प्रति व्यक्ति आय भारत के मुकाबले बहुत अधिक है, एक धनी और विकसित देश ही है। लेकिन, स्वास्थ्य खर्च में बीते दशक में अपेक्षाओं के अनुरूप सरकारी निवेश न करने का ख़ामियाजा आज उसके आम लोगों को  झेलना पड़ रहा है और जिन बुजुर्गों की बुजुर्गियत पर कभी इटली को नाज हुआ करता था, आज उन्हें मरने के लिये अकेला छोड़ दिये जाने की मर्मान्तक खबरें आ रही हैं।

    गोरखपुर और मुजफ़्फ़रपुर में गरीब, निरीह बच्चों की उचित चिकित्सा के अभाव में बड़े पैमाने पर अकाल मौत ने हमारे ध्वस्त मेडिकल सिस्टम की लाचारी उजागर कर दी थी, लेकिन देशभक्ति और रामभक्ति के शोर में उनके विवश और व्याकुल मां-बाप का करुण विलाप सुना नहीं जा सका। आज कोरोना संकट देश को झकझोरने को सामने है और यह इस देश के लोगों को सोचना है कि सरकारी मेडिकल सिस्टम को मजबूत करने में उनका कल्याण है या नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में कार्य कर रहे नीति आयोग के इस दृष्टिकोण में है कि स्वास्थ्य तंत्र के अधिकाधिक निजीकरण में ही स्वास्थ्य समस्याओं का निदान है।

    हम ईश्वर से प्रार्थना ही कर सकते हैं कि यह आकस्मिक और जानलेवा संकट हमारे देश पर कहर बन कर न टूटे, क्योंकि महामारी का प्रकोप बढ़ने की स्थिति में हमारा मेडिकल सिस्टम इस  संकट को झेलने के लिये आवश्यक आधारभूत संरचना से लैस नहीं है।

      हालांकि, मंदिरों-मस्जिदों-गिरिजाघरों सहित तमाम उपासना स्थलों को बंद किया जा रहा है और उन मूर्त्तियों या ईश्वरीय प्रतीकों को भी विश्राम दिया जा रहा है जिनके सामने हम प्रार्थना कर सकते थे।

   तो...ईश्वर के दूसरे रूप डॉक्टरों, सहयोगी मेडिकल कार्यकर्त्ताओं और उनके मंदिरों के रूप में स्थापित अस्पतालों के ऊपर ही हमारा भरोसा है।

      यह वह समय है जब हमें यह अहसास हो रहा है कि किसी ईश्वर के भव्य मंदिर के नाम पर सैकड़ों करोड़ रुपयों के खर्च से अधिक, बल्कि बहुत बहुत अधिक जरूरी है कि स्कूल और अस्पताल रूपी अधिकाधिक मंदिर बनाए जाएं और उनमें समाज के प्रतिभाशाली युवाओं को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा दे कर डॉक्टर और कंपाउंडर के रूप में नियुक्त कर पूरी मानवता को ईश्वर के दूसरे रूप की छाया दी जाए।


Wednesday, March 11, 2020

झांसी के वंशज

दो राजपरिवार ,एक के वारिस सालों से
ऐश कर रहे हैं और दूसरे के गुमनामी में ।
एक बार फिर से झांसी राजघराने के वारिसों की स्थिति ।

झांसी के अंतिम संघर्ष में महारानी की पीठ पर बंधा उनका बेटा दामोदर राव (असली नाम आनंद राव) सबको याद है. रानी की चिता जल जाने के बाद उस बेटे का क्या हुआ?
वो कोई कहानी का किरदार भर नहीं था, 1857 के विद्रोह की सबसे महत्वपूर्ण कहानी को जीने वाला राजकुमार था जिसने उसी गुलाम भारत में जिंदगी काटी, जहां उसे भुला कर उसकी मां के नाम की कसमें खाई जा रही थी.

अंग्रेजों ने दामोदर राव को कभी झांसी का वारिस नहीं माना था, सो उसे सरकारी दस्तावेजों में कोई जगह नहीं मिली थी. ज्यादातर हिंदुस्तानियों ने सुभद्रा कुमारी चौहान के कुछ सही, कुछ गलत आलंकारिक वर्णन को ही इतिहास मानकर इतिश्री कर ली.

1959 में छपी वाई एन केलकर की मराठी किताब ‘इतिहासाच्य सहली’ (इतिहास की सैर) में दामोदर राव का इकलौता वर्णन छपा.

महारानी की मृत्यु के बाद दामोदार राव ने एक तरह से अभिशप्त जीवन जिया. उनकी इस बदहाली के जिम्मेदार सिर्फ फिरंगी ही नहीं हिंदुस्तान के लोग भी बराबरी से थे.

आइये, दामोदर की कहानी दामोदर की जुबानी सुनते हैं –

15 नवंबर 1849 को नेवलकर राजपरिवार की एक शाखा में मैं पैदा हुआ. ज्योतिषी ने बताया कि मेरी कुंडली में राज योग है और मैं राजा बनूंगा. ये बात मेरी जिंदगी में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से सच हुई. तीन साल की उम्र में महाराज ने मुझे गोद ले लिया. गोद लेने की औपचारिक स्वीकृति आने से पहले ही पिताजी नहीं रहे.

मां साहेब (महारानी लक्ष्मीबाई) ने कलकत्ता में लॉर्ड डलहॉजी को संदेश भेजा कि मुझे वारिस मान लिया जाए. मगर ऐसा नहीं हुआ.

डलहॉजी ने आदेश दिया कि झांसी को ब्रिटिश राज में मिला लिया जाएगा. मां साहेब को 5,000 सालाना पेंशन दी जाएगी. इसके साथ ही महाराज की सारी सम्पत्ति भी मां साहेब के पास रहेगी. मां साहेब के बाद मेरा पूरा हक उनके खजाने पर होगा मगर मुझे झांसी का राज नहीं मिलेगा.

इसके अलावा अंग्रेजों के खजाने में पिताजी के सात लाख रुपए भी जमा थे. फिरंगियों ने कहा कि मेरे बालिग होने पर वो पैसा मुझे दे दिया जाएगा.

मां साहेब को ग्वालियर की लड़ाई में शहादत मिली. मेरे सेवकों (रामचंद्र राव देशमुख और काशी बाई) और बाकी लोगों ने बाद में मुझे बताया कि मां ने मुझे पूरी लड़ाई में अपनी पीठ पर बैठा रखा था. मुझे खुद ये ठीक से याद नहीं. इस लड़ाई के बाद हमारे कुल 60 विश्वासपात्र ही जिंदा बच पाए थे.

नन्हें खान रिसालेदार, गनपत राव, रघुनाथ सिंह और रामचंद्र राव देशमुख ने मेरी जिम्मेदारी उठाई. 22 घोड़े और 60 ऊंटों के साथ बुंदेलखंड के चंदेरी की तरफ चल पड़े. हमारे पास खाने, पकाने और रहने के लिए कुछ नहीं था. किसी भी गांव में हमें शरण नहीं मिली. मई-जून की गर्मी में हम पेड़ों तले खुले आसमान के नीचे रात बिताते रहे. शुक्र था कि जंगल के फलों के चलते कभी भूखे सोने की नौबत नहीं आई.

असल दिक्कत बारिश शुरू होने के साथ शुरू हुई. घने जंगल में तेज मानसून में रहना असंभव हो गया. किसी तरह एक गांव के मुखिया ने हमें खाना देने की बात मान ली. रघुनाथ राव की सलाह पर हम 10-10 की टुकड़ियों में बंटकर रहने लगे.

मुखिया ने एक महीने के राशन और ब्रिटिश सेना को खबर न करने की कीमत 500 रुपए, 9 घोड़े और चार ऊंट तय की. हम जिस जगह पर रहे वो किसी झरने के पास थी और खूबसूरत थी.

देखते-देखते दो साल निकल गए. ग्वालियर छोड़ते समय हमारे पास 60,000 रुपए थे, जो अब पूरी तरह खत्म हो गए थे. मेरी तबियत इतनी खराब हो गई कि सबको लगा कि मैं नहीं बचूंगा. मेरे लोग मुखिया से गिड़गिड़ाए कि वो किसी वैद्य का इंतजाम करें.

मेरा इलाज तो हो गया मगर हमें बिना पैसे के वहां रहने नहीं दिया गया. मेरे लोगों ने मुखिया को 200 रुपए दिए और जानवर वापस मांगे. उसने हमें सिर्फ 3 घोड़े वापस दिए. वहां से चलने के बाद हम 24 लोग साथ हो गए.

ग्वालियर के शिप्री में गांव वालों ने हमें बागी के तौर पर पहचान लिया. वहां तीन दिन उन्होंने हमें बंद रखा, फिर सिपाहियों के साथ झालरपाटन के पॉलिटिकल एजेंट के पास भेज दिया. मेरे लोगों ने मुझे पैदल नहीं चलने दिया. वो एक-एक कर मुझे अपनी पीठ पर बैठाते रहे.

हमारे ज्यादातर लोगों को पागलखाने में डाल दिया गया. मां साहेब के रिसालेदार नन्हें खान ने पॉलिटिकल एजेंट से बात की.

उन्होंने मिस्टर फ्लिंक से कहा कि झांसी रानी साहिबा का बच्चा अभी 9-10 साल का है. रानी साहिबा के बाद उसे जंगलों में जानवरों जैसी जिंदगी काटनी पड़ रही है. बच्चे से तो सरकार को कोई नुक्सान नहीं. इसे छोड़ दीजिए पूरा मुल्क आपको दुआएं देगा.

फ्लिंक एक दयालु आदमी थे, उन्होंने सरकार से हमारी पैरवी की. वहां से हम अपने विश्वस्तों के साथ इंदौर के कर्नल सर रिचर्ड शेक्सपियर से मिलने निकल गए. हमारे पास अब कोई पैसा बाकी नहीं था.

सफर का खर्च और खाने के जुगाड़ के लिए मां साहेब के 32 तोले के दो तोड़े हमें देने पड़े. मां साहेब से जुड़ी वही एक आखिरी चीज हमारे पास थी.

इसके बाद 5 मई 1860 को दामोदर राव को इंदौर में 10,000 सालाना की पेंशन अंग्रेजों ने बांध दी. उन्हें सिर्फ सात लोगों को अपने साथ रखने की इजाजत मिली. ब्रिटिश सरकार ने सात लाख रुपए लौटाने से भी इंकार कर दिया.

दामोदर राव के असली पिता की दूसरी पत्नी ने उनको बड़ा किया. 1879 में उनके एक लड़का लक्ष्मण राव हुआ.दामोदर राव के दिन बहुत गरीबी और गुमनामी में बीते। इसके बाद भी अंग्रेज उन पर कड़ी निगरानी रखते थे। दामोदर राव के साथ उनके बेटे लक्ष्मणराव को भी इंदौर से बाहर जाने की इजाजत नहीं थी।
इनके परिवार वाले आज भी इंदौर में ‘झांसीवाले’ सरनेम के साथ रहते हैं. रानी के एक सौतेला भाई चिंतामनराव तांबे भी था. तांबे परिवार इस समय पूना में रहता है. झाँसी के रानी के वंशज इंदौर के अलावा देश के कुछ अन्य भागों में रहते हैं। वे अपने नाम के साथ झाँसीवाले लिखा करते हैं। जब दामोदर राव नेवालकर 5 मई 1860 को इंदौर पहुँचे थे तब इंदौर में रहते हुए उनकी चाची जो दामोदर राव की असली माँ थी। बड़े होने पर दामोदर राव का विवाह करवा देती है लेकिन कुछ ही समय बाद दामोदर राव की पहली पत्नी का देहांत हो जाता है। दामोदर राव की दूसरी शादी से लक्ष्मण राव का जन्म हुआ। दामोदर राव का उदासीन तथा कठिनाई भरा जीवन 28 मई 1906 को इंदौर में समाप्त हो गया। अगली पीढ़ी में लक्ष्मण राव के बेटे कृष्ण राव और चंद्रकांत राव हुए। कृष्ण राव के दो पुत्र मनोहर राव, अरूण राव तथा चंद्रकांत के तीन पुत्र अक्षय चंद्रकांत राव, अतुल चंद्रकांत राव और शांति प्रमोद चंद्रकांत राव हुए।

दामोदर राव चित्रकार थे उन्होंने अपनी माँ के याद में उनके कई चित्र बनाये हैं जो झाँसी परिवार की अमूल्य धरोहर हैं।

उनके वंशज श्री लक्ष्मण राव तथा कृष्ण राव इंदौर न्यायालय में टाईपिस्ट का कार्य करते थे ! अरूण राव मध्यप्रदेश विद्युत मंडल से बतौर जूनियर इंजीनियर 2002 में सेवानिवृत्त हुए हैं। उनका बेटा योगेश राव सॅाफ्टवेयर इंजीनियर है। वंशजों में प्रपौत्र अरुणराव झाँसीवाला, उनकी धर्मपत्नी वैशाली, बेटे योगेश व बहू प्रीति का धन्वंतरिनगर इंदौर में सामान्य नागरिक की तरह माध्यम वर्ग परिवार है
इतिहास

Tuesday, October 29, 2019

दिपावली

दीवाली की अवधी परम्पराऐं और रीति-रिवाज
अब धीरे धीरे ख़ात्मे की ओर है ..!
घरों की सफाई, रंगाई-पुताई के बाद लगभग
हफ्ते भर का यह त्योहार बड़े उत्साह से मनाया
जाता है...!

पुतना बनाना... दीवाल पर चित्रांकन करने की
और घरौंदे बनाने की लगभग खत्म हो चुकी है
इसकी जगह कलेंडर ने ले ली है ।
मिट्टी के खिलौने...कुम्हारों द्वारा बनाये गए
गणेश लक्ष्मी,घर-गृहस्थी, हाथी-घोड़ा,मटका-
मटकी आदि खिलौने भी बनते ।
गणेश-लक्ष्मी की पूजा...शंकरपुत्र गणेश के दाएं
लक्ष्मी स्थापित की जाती है क्योंकि वह भी मां
समान (चाची) है ।
गोवर्धन पूजा...56 सब्जियों के अन्नकूट का
भोग लगता है इसे चिरैयागौर भी कहते है ।
पूजा के बाद उसे समेट कर गोबर का पर्वत बनाया जाता है उसे करवा चौथ की सींकों से सजा कर दिया जलाया जाता है ।
भैया दूज (यम द्वितीया)...सूर्यपुत्र यमराज ने
यमुना किनारे रोचना कराया था । कहते है कि
यदि भाई-बहन स्नान कर रोचना लगवाये तो
यमराज की यातनाओं से मुक्त रहेंगे ।
अलाय-बलाय... दीवाली की रात तारे देख कर
सन की टहनियां जलाकर घर से 
निकाली जाती है ।
सच्चा मोती खिलाना...दीवाली की रात में जादू
जगाये जाते हैं ,तांत्रिक प्रयोग होते है । छोटे बच्चों के गले मे काले धागे में छोटे नीबूं और
सात जवा लहसुन पिरोकर पहनाया जाता है
और उन्हें पेड़े के साथ सच्चा मोती पीस कर
खिलाया जाता है ।
कौड़ियां जगाना...रात को कौड़ियां जगाई जाती
है, कौड़ी संसार की प्राचीनतम मुद्रा है। लोग
16 कौड़ियों की सौराही खेलते है अब लोग ताश
खेलते है ।
खील-बताशे, चूरा-गट्टा.... यह त्योहार
फसलों से जुड़ा है खरीफ की पैदावार धान और
गन्ना देवताओं को अर्पित किया जाता है ।
नाली पर दिया रखना...यह त्योहार नरकासुर
रॉक्षस पर विजय का पर्व है इस लिए नाली पर
दिया रखते है ।
काजल का पारा जाना....एक पक्के दिए को
सरसो के तेल डाल उस पर कच्चे दिए को रख
काजल पारा जाता है और रात में पूरे परिवार
को लगाया जाता है ।

समय के साथ धीरे धीरे परम्पराएं और रीतिरिवाज लगभग समाप्त होते गए और आज
हम सिर्फ खाना पूरी करते है